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भारत निर्वाचन आयोग:

भारत में संघ सरकार को पांच साल की अवधि के लिए चुना जाता है। देश में चुनाव हर पांच साल में होते हैं। भारत निर्वाचन आयोग देश में पूरी चुनाव प्रक्रिया का संचालन और प्रबंधन करता है। चुनाव आयोग वर्ष 1950 में अस्तित्व में आया।

शुरुआत में, इसमें सिर्फ एक सदस्य शामिल था। 1989 में भारत के चुनाव आयोग के लिए दो और आयुक्तों की नियुक्ति की गई। चुनाव प्रक्रिया को सुचारू और सफल बनाने के लिए हर राज्य में चुनाव आयोग की एक सहायक समिति बनाई गई है।

चुनाव आयोग की मुख्य जिम्मेदारी चुनाव प्रक्रिया का प्रबंधन करना है। कार्य विनम्र है और इसे पूरा करने के लिए बहुत सी बातों का ध्यान रखना चाहिए। इसमें चुनाव कार्यक्रम की योजना बनाना, नए राजनीतिक दलों का आकलन करना और उन्हें मान्य करना, चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दलों के व्यवहार को देखना होता है।

इसके साथ ही आयोग को मीडिया को चुनाव संबंधी अपडेट प्रदान करना, चुनाव प्रक्रिया की देखरेख करना, किसी भी कदाचार के खिलाफ कार्रवाई करना और उपचुनाव कराना (यदि आवश्यक हो ) कर्त्तव्य निभाना होता है। चुनाव आयोग अपनी स्थापना के समय से ही कड़ी मेहनत कर रहा है और चुनाव प्रक्रिया में सुधार के लिए भारत की चुनावी प्रणाली में कई बदलाव आये हैं।

चुनाव आयोग लोकसभा और राज्यसभा चुनाव, राज्य विधान परिषद और राज्य विधान सभा चुनाव और भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का संचालन करता है। इस प्रकार इसे भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ कहा जाता है।

मतदान ना करने से देश का अहित

आज भी हमारे देश में मतदान के समय बहुत ही कम मतदान होता है जिसका प्रभाव सीधे हमारे देश के विकास और उसके भविष्य पर पड़ता है। देश की आम जनता में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें मतदान करने का महत्व ही नहीं पता और इसी वजह से वो चुनाव के समय अपना कीमती मत नहीं डालते।

लेकिन जो मतदान नहीं करते वो ये नहीं जानते की उनके मतदान ना करने से देश का कितना बड़ा अहित होता है। जब सही मतदान नहीं होता तो ऐसे प्रतिनिधि चुनकर आते हैं जो भ्रष्ट होते हैं, कम पढे-लिखे होते हैं और जिन्हें देश को चलाने का कोई अनुभव नहीं होता। जब ऐसे प्रतिनिधि चुनकर आते हैं तब देश में भ्रष्टाचार बढ़ता है, सरकार अपना ईमानदारी से काम नहीं करती और देश की आम जनता को महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गरीबी आदि का सामना करना पड़ता है।

मतदान जब तक सभी लोग नहीं करते तब तक ऐसे ही भ्रष्ट लोग चुनकर आते हैं जो देश को दीमक की तरह खोखला कर देते हैं। यदि सभी आम लोग अपनी ज़िम्मेदारी समझकर मतदान में भाग लें तो ऐसे भ्रष्ट लोगों के चुनकर आने की संभावना खतम हो जाएगी।

एक लोकतांत्रिक देश में अधिकार:

राजशाही और तानाशाही सरकार के विपरीत, एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को कई अधिकारों के साथ सशक्त बनाया जाता है जो उनके विकास के साथ-साथ देश के समग्र विकास और विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। यहां लोकतांत्रिक तरीके से स्थापित नागरिकों को दिए गए अधिकारों पर एक संक्षिप्त नज़र है:

भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: यह एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में प्रत्येक नागरिक को दिया गया मौलिक अधिकार है। एक लोकतांत्रिक देश के नागरिकों को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों सहित किसी भी मामले पर अपनी राय व्यक्त करने का पूरा अधिकार है।

मत देने का अधिकार:मतदान का अधिकार प्रत्येक लोकतांत्रिक राष्ट्र के नागरिकों को दिया जाता है। वे इस अधिकार का प्रयोग करके अपने देश की सरकार का चुनाव करते हैं।

फेयर ट्रायल का अधिकार:एक लोकतांत्रिक देश के नागरिकों को स्वतंत्र और सिर्फ कानूनी प्रक्रियाओं का अधिकार है। वे किसी पर भी मुकदमा कर सकते हैं, जिन्होंने भारतीय दंड संहिता के अनुसार उनके साथ गलत किया है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायपालिका द्वारा निर्णय लिया जाता है। एक न्यायिक प्रणाली का निर्माण करना लोकतांत्रिक राष्ट्र की जिम्मेदारी है, जिस पर लोग भरोसा कर सकें।

स्वतंत्र मीडिया का अधिकार:पारदर्शिता होने पर लोकतंत्र प्रभावी रूप से कार्य कर सकता है। लोकतांत्रिक तरीके से स्थापित लोगों को सूचना का पूरा अधिकार है। सरकार और राजनीतिक दलों के काम करने की यह जानकारी उन्हें मीडिया द्वारा प्रदान की जाती है। यह जानकारी उन्हें सही उम्मीदवारों का चयन करने और समझने में मदद करती है कि क्या उन्हें अगले चुनाव में अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।

पूजा का अधिकार:एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक उस धर्म को चुन सकते हैं जिसे वे राज्य या किसी राजनीतिक दल के हस्तक्षेप के बिना पालन करना चाहते हैं। वे बिना किसी डर के मुफ्त सेटिंग में पूजा कर सकते हैं। किसी भी तरह के सांप्रदायिक दंगों की निंदा की जाती है और सरकार इसमें शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करती है।

भारत में लोकतंत्र पर निबंध 3 (400 शब्द)

प्रस्तावना

लोकतंत्र से तात्पर्य लोगों के द्वारा, लोगों के लिए चुनी सरकार से है। लोकतांत्रिक राष्ट्र में नागरिकों को वोट देने और उनकी सरकार का चुनाव करने का अधिकार प्राप्त होता है। लोकतंत्र को विश्व के सबसे अच्छे शासन प्रणाली के रुप में जाना जाता है, यही कारण है कि आज विश्व के अधिकतम देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू है।

भारतीय लोकतंत्र की विशेषताएं

वर्तमान समय में भारत दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र है। मुगलों, मौर्य, ब्रिटिश और अन्य कई शासकों द्वारा शताब्दियों तक शासित होने के बाद भारत आखिरकार 1947 में आजादी के बाद एक लोकतांत्रिक देश बना। इसके बाद देश के लोगों को, जो कई सालों तक विदेशी शक्तियों के हाथों शोषित हुए, अंत में वोटों के द्वारा अपने स्वयं के नेताओं को चुनने का अधिकार प्राप्त हुआ। भारत में लोकतंत्र केवल अपने नागरिकों को वोट देने का अधिकार प्रदान करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक समानता के प्रति भी काम कर रहा है।

भारत में लोकतंत्र पांच लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर काम करता है:

  • संप्रभु:इसका मतलब भारत किसी भी विदेशी शक्ति के हस्तक्षेप या नियंत्रण से मुक्त है।
  • समाजवादी:इसका मतलब है कि सभी नागरिकों को सामाजिक और आर्थिक समानता प्रदान करना।
  • धर्मनिरपेक्षता:इसका अर्थ है किसी भी धर्म को अपनाने या सभी को अस्वीकार करने की आजादी।
  • लोकतांत्रिक:इसका मतलब है कि भारत सरकार अपने नागरिकों द्वारा चुनी जाती है।
  • गणराज्य:इसका मतलब यह है कि देश का प्रमुख एक वंशानुगत राजा या रानी नहीं है।

भारत में लोकतंत्र कैसे कार्य करता है

18 वर्ष से अधिक आयु का हर भारतीय नागरिक भारत में वोट देने का अधिकार का उपयोग कर सकता है। मतदान का अधिकार प्रदान करने के लिए किसी व्यक्ति की जाति, पंथ, धर्म, लिंग या शिक्षा के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता है। भारत में कई पार्टियाँ है जिनके उम्मीदवार उनकी तरफ से चुनाव लड़ते हैं जिनमें प्रमुख है भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया- मार्क्सिस्ट (सीपीआई-एम), अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आदि। उम्मीदवारों को वोट देने से पहले जनता इन पार्टियों या उनके प्रतिनिधियों के आखिरी कार्यकाल में किये गये कार्यों का मूल्यांकन करते हुए, अपना मतदान करती है।

सुधार के लिए क्षेत्र

भारतीय लोकतंत्र में सुधार की बहुत गुंजाइश है इसके सुधार के लिए ये कदम उठाए जाने चाहिए:

  1. गरीबी उन्मूलन
  2. साक्षरता को बढ़ावा देना
  3. लोगों को वोट देने के लिए प्रोत्साहित करना
  4. लोगों को सही उम्मीदवार चुनने के लिए शिक्षित करना
  5. बुद्धिमान और शिक्षित लोगों को नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित करना
  6. सांप्रदायिकता का उन्मूलन करना
  7. निष्पक्ष और जिम्मेदार मीडिया सुनिश्चित करना
  8. निर्वाचित सदस्यों के कामकाज की निगरानी करना
  9. लोकसभा तथा विधानसभा में ज़िम्मेदार विपक्ष का निर्माण करना

निष्कर्ष

हालांकि भारत में लोकतंत्र को अपने कार्य के लिए दुनिया भर में सराहा जाता है पर फिर भी इसमें सुधार के लिए अभी भी बहुत गुंजाइश है। देश में लोकतंत्र कार्यप्रणाली को सुनिश्चित करने के लिए ऊपर बताए क़दमों को प्रयोग में लाया जा सकता है।

लोकतंत्र में मतदान का महत्व निबंध (200 शब्द)

हमारा भारत देश एक लोकतांत्रिक देश है जहां आम जनता को ही सर्वोपरि माना जाता है। यह आम जनता ही मतदान के द्वारा देश का शासक तय करती है। लोकतंत्र में मतदान बहुत जरूरी है और जब तक मतदान करने का हक आम लोगों के पास है तभी तक देश में लोकतंत्र है।

जिस देश में मतदान करने का अधिकार आम जनता के पास नहीं होता वहाँ लोकतंत्र का राज नहीं होता बल्कि ऐसे देश में तानाशाही का राज होता है। मतदान लोकतंत्र की प्राणवायु है अतः सभी को इसके महत्व के बारे में जरूर पता होना चाहिए।

लोकतंत्र में आम लोगों द्वारा किया गया मतदान ही तय करता है की देश का प्रतिनिधि कैसा होगा। जब देश में सभी मतदान करते हैं तो निश्चित रूप से हमें एक अच्छी और ईमानदार सरकार मिलती है। लेकिन जब आम लोग मतदान के महत्व को ना समझकर मतदान में भाग नहीं लेते तो ऐसे प्रतिनिधि चुनकर आते हैं जो अयोग्य होते हैं और भ्रष्ट होते हैं। जब ऐसे भ्रष्ट लोग चुनकर आते हैं तब देश को सबसे बड़ा नुकसान होता है और इसका जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि वही आम लोग हैं जो मतदान नहीं करते।

मतदान करना हमारा अधिकार भी है और कर्तव्य भी अतः हम सभी को मतदान का महत्व पता होना चाहिए और मतदान में शामिल होना चाहिए।

भारत के लोकतांत्रिक सिद्धांत:

सॉवरेन:सॉवरिन एक ऐसी इकाई को संदर्भित करता है जो किसी भी विदेशी शक्ति के नियंत्रण से मुक्त है। भारत के नागरिक अपने मंत्रियों को चुनने के लिए संप्रभु सत्ता का आनंद लेते हैं।

समाजवादी:समाजवादी का अर्थ है भारत के सभी नागरिकों को उनकी जाति, रंग, पंथ, लिंग और धर्म के बावजूद सामाजिक और आर्थिक समानता प्रदान करना।

धर्म निरपेक्ष:धर्मनिरपेक्ष का अर्थ है किसी की पसंद के धर्म का अभ्यास करने की स्वतंत्रता। देश में कोई आधिकारिक राज्य धर्म नहीं है।

डेमोक्रेटिक:इसका मतलब है कि भारत सरकार अपने नागरिकों द्वारा चुनी जाती है। मतदान का अधिकार सभी भारतीय नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के दिया जाता है।

गणतंत्र:देश का मुखिया वंशानुगत राजा या रानी नहीं होता है। वह एक निर्वाचक मंडल द्वारा चुना जाता है।

कितना सफल है भारत का लोकतंत्र?

अपने 71 वर्षों के सफर में भारत का लोकतंत्र कितना सफल रहा, यह देखने के लिये इन वर्षों का इतिहास, देश की उपलब्धियाँ, देश का विकास, सामाजिक-आर्थिक दशा, लोगों की खुशहाली आदि पर गौर करने की ज़रूरत है। भारत का लोकतंत्र बहुलतावाद पर आधारित राष्ट्रीयता की कल्पना पर आधारित है। यहाँ की विविधता ही इसकी खूबसूरती है। सिर्फ दक्षिण एशिया को ही लें तो, भारत और क्षेत्र के अन्य देशों के बीच यह अंतर है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका में उनके विशिष्ट धार्मिक समुदायों का दबदबा है। लेकिन, धर्मनिरपेक्षता भारत का एक बेहद सशक्त पक्ष रहा है। सूचकांक में भारत का पड़ोसी देशों से बेहतर स्थिति में होने के पीछे यह एक बड़ा कारण है।

पिछले 71 सालों में देश ने प्रगति की है, काफी विकास किया है। देशवासियों का जीवन-स्तर पहले से बेहतर हुआ है। सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के लोग एक ही समाज में एक साथ रहते हैं। कृषि, औद्योगिक विकास, शिक्षा, चिकित्सा, अंतरिक्ष विज्ञान जैसे कई क्षेत्रों में भारत ने कामयाबी हासिल की है। अर्थव्यवस्था के मामले में हम दुनिया की छठी बड़ी शक्ति हैं। आज हमारे पास विदेशी मुद्रा का विशाल भंडार है। लेकिन किसी लोकतंत्र की सफलता को आँकने के लिये ये पर्याप्त नहीं हैं।इसमें कोई शक नहीं कि देश का विकास तो हुआ है, लेकिन देखना यह होगा कि विकास किन वर्गों का हुआ। सामाजिक समरसता के धरातल पर विकास का यह दावा कितना सटीक बैठता है। दरअसल, किसी लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार ने गरीबी, निरक्षरता, सांप्रदायिकता, लैंगिक भेदभाव और जातिवाद को किस हद तक समाप्त किया है। लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति क्या है और सामाजिक तथा आर्थिक असमानता को कम करने के क्या-क्या प्रयास हुए हैं।

इन सभी मोर्चों पर भारत का प्रदर्शन कोई बहुत उल्लेखनीय तो नहीं ही रहा है।

भारत में लोकतंत्र पर निबंध 2 (300 शब्द)

प्रस्तावना

लोकतंत्र को विश्व के सबसे अच्छे शासन प्रणाली के रुप में जाना जाता है। यह देश के प्रत्येक नागरिक को वोट देने और उनकी जाति, रंग, पंथ, धर्म या लिंग के बावजूद अपनी इच्छा से अपने नेताओं का चयन करने की अनुमति प्रदान करता है। हमारे देश में सरकार आम लोगों द्वारा चुनी जाती है और यह कहना गलत नहीं होगा कि यह उनकी बुद्धि और जागरूकता है जिससे वे सरकार की सफलता या विफलता निर्धारित करतें हैं।

भारत की लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली

भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली लागू, इसके साथ ही भारत को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रुप में भी जाना जाता है। हमारे देश का लोकतंत्र संप्रभु, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक गणराज्य सहित पांच लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर कार्य करता है। 1947 में अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत को एक लोकतांत्रिक राष्ट्र घोषित किया गया था। आज के समय में हमारे देश को ना सिर्फ विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रुप में जाना जाता है बल्कि कि इसके साथ ही इसे विश्व के सबसे सफल लोकतंत्रों में से एक लोकतंत्र के रुप में भी जाना जाता है।

भारतीय लोकतंत्र का एक संघीय रूप है जिसके अंतर्गत केंद्र में एक सरकार जो संसद के प्रति उत्तरदायी है तथा राज्य के लिए अलग-अलग सरकारें हैं जो उनके विधानसभाओं के लिए समान रूप से जवाबदेह हैं। भारत के कई राज्यों में नियमित अंतराल पर चुनाव आयोजित किए जाते हैं। इन चुनावों में कई पार्टियां केंद्र तथा राज्यों में जीतकर सरकार बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा करती हैं। अक्सर लोगों को सबसे योग्य उम्मीदवार का चुनाव करने के लिए अपने अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है लेकिन फिर भी जातीय समीकरण भारतीय राजनीति में भी एक बड़ा कारक है चुनावी प्रक्रियाओं को मुख्य रुप से प्रभावित करते है।

चुनाव प्रचार के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा अभियान चलाया जाता है ताकि लोगों के विकास के लिए उनके भविष्य के एजेंडे पर लाभ के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों पर जोर दिया जा सके।

भारत में लोकतंत्र का मतलब केवल वोट देने का अधिकार ही नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक समानता को भी सुनिश्चित करना है। हालांकि हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को विश्वव्यापी प्रशंसा प्राप्त हुई है पर अभी भी ऐसे कई क्षेत्र हैं जिनमें हमारे लोकतंत्र को सुधार की आवश्यकता है ताकि लोकतंत्र को सही मायनों में परिभाषित किया जा सके। सरकार को लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए निरक्षरता, गरीबी, सांप्रदायिकता, जातिवाद के साथ-साथ लैंगिग भेदभाव को खत्म करने के लिए भी काम करना चाहिए।

निष्कर्ष

लोकतंत्र को विश्व के सबसे अच्छे शासन प्रणाली के रुप में जाना जाता है, यही कारण है कि हमारे देश के संविधान निर्माताओं और नेताओं ने शासन प्रणाली के रुप में लोकतांत्रिक व्यवस्था का चयन किया। हमें अपने देश के लोकतंत्र को और भी मजबूत करने की आवश्यकता है।

भारत में लोकतंत्र पर निबंध, democracy in india dissertation in hindi (200 शब्द)

लोकतंत्र सरकार की एक प्रणाली है जो नागरिकों को वोट देने और अपनी पसंद की सरकार चुनने की अनुमति देती है। 1947 में ब्रिटिश शासन से आजादी के बाद भारत एक लोकतांत्रिक राज्य बन गया। यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र है।

भारत में लोकतंत्र अपने नागरिकों को उनकी जाति, रंग, पंथ, धर्म और लिंग के बावजूद वोट देने का अधिकार देता है। इसके पांच लोकतांत्रिक सिद्धांत हैं – संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणतंत्र।

विभिन्न राजनीतिक दल समय-समय पर राज्य के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी चुनाव के लिए खड़े होते हैं। वे अपने पिछले कार्यकाल में किए गए कार्यों के बारे में प्रचार करते हैं और अपनी भविष्य की योजनाओं को भी लोगों के साथ साझा करते हैं। 18 वर्ष से अधिक आयु के भारत के प्रत्येक नागरिक को मतदान का अधिकार है। अधिक से अधिक लोगों को वोट डालने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सरकार निरंतर प्रयास कर रही है। लोगों को चुनाव के लिए खड़े उम्मीदवारों के बारे में सब कुछ पता होना चाहिए और सुशासन के लिए सबसे योग्य एक के लिए मतदान करना चाहिए।

भारत एक सफल लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए जाना जाता है। हालांकि, कुछ खामियां हैं जिन पर काम करने की जरूरत है। अन्य बातों के अलावा, सरकार को सच्चे अर्थों में लोकतंत्र को सुनिश्चित करने के लिए गरीबी, अशिक्षा, सांप्रदायिकता, लैंगिक भेदभाव और जातिवाद को खत्म करने पर काम करना चाहिए।

राजनीतिकदलों कीलोकतन्त्र में महत्वपूर्ण भूमिका (Significance of Political Functions in Democracy):

लोकतान्त्रिक प्रणाली चाहे किसी प्रकार की हो, उसे व्यवहारिक रूप देने में राजनीतिक दल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ।

दलों की निम्न भूमिका महत्वपूर्ण है:

(i) वर्तमान में राज्यों की बड़ी जनसंख्या के कारण प्रत्यक्ष प्रजातंत्र संभव नहीं है । अत: अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र ही वर्तमान में लोकतंत्र का व्यवहारिक रूप है अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र में चुनाव आवश्यक हैं तथा चुनावों के आधार पर बहुमत की सरकार बनाने के लिये राजनीतिक दल आवश्यक हैं ।

(ii) राजनीतिक दल जनता में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न करते हैं तथा राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाते हैं, जोकि लोकतंत्र की सफलता के लिये आवश्यक है ।

(iii) राजनीतिक दल सरकार व जनता के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं तथा जनता की समस्याओं से सरकार को अवगत कराते हैं ।

(iv) विपक्षी दल के रूप में राजनीतिक दल सरकार की तानाशाही व मनमानेपन पर रोक लगाते हैं । अत: रातनीतिक दल न केवल लोकतंत्र को व्यवहारिक रूप देने अपितु लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने के लिये आवश्यक हैं ।

राजनीति व सरकार में प्रभुत्व के आधार पर भारतीय राजनीति को सुविधा की दृष्टि से तीन युगों में बाँटा जा सकता है:

(i) एकदलीय प्रभुत्व का युग, 1952 से 1967 तक, जिसमें केन्द्र में बिना किसी चुनौती के कांग्रेस पार्टी का शासन रहा । इस काल में दूसरे दलों का प्रभाव नगण्य था ।

(ii) कांग्रेस पार्टी की चुनौतियों तथा उसके वर्चस्व की पुनर्स्थापना का युग, 1967 से 1989 तक, जिसमें केन्द्र तथा राज्यों दोनों स्तरों पर कांग्रेस को नये दलों से चुनौती का सामना करना पड़ा तथा उसने पुन: अपने वर्चस्व की स्थापना का प्रयास किया ।

(iii) गठबन्धन की राजनीति का युग, 1989 से अब तक, जिसमें कांग्रेस के प्रभुत्व में कमी आयी क्षेत्रीय दलों का महत्व बढ़ा तथा केन्द्रीय स्तर पर गठबन्धन की नयी राजनीति का आरंभ हुआ । गठबन्धन की राजनीति का मतलब है कि कई दलों द्वारा मिल-जुलकर सरकार का गठन क्योंकि किसी भी दल को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं प्राप्त हो पा रहा है । वर्तमान में भारत की केन्द्रीय राजनीति में दो गठबन्धन सक्रिय हैं-प्रथम कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन अर्थात् यू. पी. ए. तथा दूसरा भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन अर्थात् एन. डी. ए. ।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु

  • रिपोर्ट में दुनिया के 167 देशों को शासन के आधार पर चार तरह के पैरामीटर्स पर रैंकिंग दी गई है, जिनमें पूर्ण लोकतंत्र, दोषपूर्ण लोकतंत्र, हाइब्रिड शासन और सत्तावादी शासन शामिल हैं।
  • 167 देशों में केवल twenty देशों कोपूर्ण लोकतांत्रिकदेश बताया गया है और इसके तहत 167 देशों की केवल 5. 5 फीसदी आबादी शामिल है।
  • सबसे ज़्यादा 43. 2 फीसदी आबादीदोषपूर्ण लोकतांत्रिक देशोंमें बसती है और इसके तहत कुल 55 देश शामिल हैं।
  • हाइब्रिड शासनके तहत 39 और सत्तावादी शासन के तहत 53 देशों को शामिल किया गया है।
  • मध्य-अमेरिका का कोस्टा रिका एकमात्र ऐसा देश है जिसने दोषपूर्ण लोकतंत्र की श्रेणी से निकलकर पूर्ण लोकतंत्र की श्रेणी में जगह बना ली है।
  • मध्य अमेरिका के ही निकारागुआ में लोकतंत्र पर भरोसा कम हुआ है और वह दोषपूर्ण लोकतंत्र से सत्तावादी शासन की श्रेणी में चला गया है।
  • 2017 के मुकाबले 2018 में जहाँ 42 देशों के कुल स्कोर में कमी आई है, वहीं 48 देश ऐसे भी हैं जिनके कुल अंकों में बढ़ोतरी हुई है।